Shyam, Phir Ek Bar Tum Mil Jate By Dinkar Joshi :  (Book In Hindi)-Hardback

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Sale price  Rs. 225.00 INR Regular price  Rs. 400.00 INR
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दौड़कर उसने कृष्ण के पाँव से तीर खींचने के लिए हाथ बढ़ाया । कृष्ण उसकी व्यग्रता को निमिष- भर ताकते रहे; फिर निषेध में दाहिना हाथ उठाया ।

जरा ठिठक गया- '' क्यों; नाथ; क्यों?''

'' रहने दो; भाई! माता गांधारी के वचन में व्यवधान बनने का व्यर्थ प्रयत्न मत करो!'' बड़ी धीरता से वे बोले ।

'' मैंने महापातक किया है! मुझे क्षमा करो; नाथ! मैंने.. .मैंने आपको जंगली प्राणी समझकर आप पर तीर चलाया । यह मैंने क्या किया; नाथ!'' जरा भूमि पर लोटकर करुण क्रंदन करने लगा ।

'' उठो वत्स!'' करुणार्द्र स्वर में कृष्ण बोले; '' तुम्हारा नाम क्या है?''

'' मेरा नाम ?. .जरा ! ''

'' जरा !. .ठीक!'' कृष्ण का मधुर हास्य छलका । तलवे से बहकर रक्तधारा भूमि पर काफी दूर चली गई थी । '' जरा; तुम्हारा नाम सार्थक है; तात ! ' जरा ' कभी किसीको नहीं छोड़ती ! अमरत्व के अभिशाप ने जिसे घेरा हो; उसे भी महाकाल जरा समेट ही लेता है न! जरा; तू तो निमित्त मात्र है; वत्स!''— इसी उपन्यास से

कोई भी भारतीय भाषा ऐसी नहीं है जिसमें श्रीकृष्ण को केंद्र में रखकर काव्य; कहानी; उपन्यास. नाटक; संदर्भ-ग्रंथ आदि साहित्य का सर्जन न किया गया हो ।

' श्याम; फिर एक बार तुम मिल जाते ' (मूल गुजराती में लिखा) उपन्यास इन सबसे अनूठा इसलिए है कि यह सिर्फ उपन्यास नहीं है-यह तो उपनिषद् है! यथार्थ कहा जाए तो यह उपनिषदीय उपन्यास है ।

तत्कालीन आर्यावर्त्त में श्रीकृष्ण एक विराट् व्यक्तित्व था । जब यह व्यक्तित्व अनंत में विलीन हो गया तो जो सन्नाटा छा गया; उस सन्नाटे के चीत्कार का यह आलेखन है जब श्रीकृष्ण सम्मुख थे तब बात और थी जब वे विलीन हो गए तब वसुदेव-देवकी से लेकर अर्जुन; द्रौपदी; अश्वत्थामा; अक्रूर उद्धव और राधा पर्यंत पात्रों की संभ्रमिद मनोदशा को एक अनूठी ऊँचाई के ऊपर ले जाता है यह उपन्यास ।

Product Specifications

Pages: 160
Language: Hindi
Author: Dinkar Joshi
Binding: Hardcover
Publisher: Prabhat Prakashan

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